बात पुरानी है, पर ज्यादा पुरानी भी नहीं। हुआ ये कि मैं लखनऊ में सड़क के किनारे खड़ा अपने एक मित्र से बातें कर रहा था। सामने एक नर्सिंग होम था, हमारी बातें चल ही रही थी कि मैने देखा सामने नर्सिंग होम से एक महिला नवजात बच्चे को गोद में लिए बाहर निकल रही है। पीछे उसका पति भी आ रहा था जिसके सिर पर बिस्तर और हाथ में लटके झोले में काफी सामान है। नर्सिंग होम के बाहर रिक्शा पहले से खड़ा था, महिला ने रिक्शे वाले से बात की और वह उस पर सवार होने की कोशिश करने लगी। बच्चे को लेकर रिक्शे पर चढ़ नहीं पा रही थी, लिहाजा उसने बच्चा रिक्शे वाले को थमा दिया, लेकिन इसके बाद भी वो रिक्शे पर नहीं चढ़ पाई, उसके चेहरे से लग रहा था कि वो काफी दर्द महसूस कर रही है। अब मुझसे रहा नहीं गया, मैं सड़क पार करके उसके पास गया और पूछा क्या दिक्कत है ? पता चला कि आँपरेशन से बेटा हुआ है, पेट में टांके लगे है, इसलिए उसे रिक्शे पर चढ़ने में परेशानी हो रही है। मैने उसे अपनी कार में बैठने का आग्रह किया और उन्हें रेलवे स्टेशन तक छोड़ दिया। कार से उतरने पर उसके पति ने मेरा पैर पकड़ लिया और इतनी सी मदद के लिए वह इतनी दुआएं देने लगा कि मन भारी हो गया। उसकी एक बात से तो सच में आंखों में आंसू आ गए। बोला साहेब ! ई बेटवा बहुते भागवान अहै, अउते हम्मैं गाड़ी पे बिठवाइ देहलस। मतलब बेटा बहुत भाग्यवान है, आज तक हम कार पर नहीं बैठे थे, इसने आते ही हमें कार की सवारी करने का मौका दे दिया।
उसकी इस छोटी सी खुशी में खुद को शामिल करता हुआ मैं वापस लौट रहा था और मन में तरह-तरह के विचार जन्म ले रहे थे। सच में कई बार जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जो आदमी को बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देती हैं। आदमी बीते जीवन में झांक कर आत्ममंथन करने लगता है कि अब तक उसने किया क्या और पाया क्या? सच कहूं तभी उसका हकीकत से सामना भी होता है। मसलन करने की सूची तो बहुत लंबी होती है, ये भी किया, वो भी किया, यहां भी किया, वहां भी किया, जिसने भी जो कहा, सब किया ! फिर बारी आती है कि इतना सब कुछ करने के बाद हासिल क्या हुआ ? आदमी दिमाग पर बहुत जोर डालता है कि सब कुछ करने के बाद हासिल क्या हुआ है, तब वो निराश हो जाता है, फिर उसे लगता है कि अब तक का तो जीवन ही बेमकसद रहा है, क्योंकि इतनी मेहनत, समय, त्याग, तपस्या के एवज में मिला क्या, कुछ भी तो नहीं। अब आदमी सोचता है कि क्या उसका मकसद गलत था या रास्ता ! तब उसकी आंख खुलती है और सामने आता है ए नया सच ! वो ये कि ना ही उसका रास्ता गलत था और ना ही मकसद गलत था, दरअसल उसने जीवन में कोई लक्ष्य ही तय नहीं किया था और बैल की तरह बिना लक्ष्य के मेहनत करता जा रहा था। जब हासिल करने का कुछ लक्ष्य ही सामने नहीं है तो किस्मत पर दोष देना बेमानी है।
इस छोटी सी मदद के एवज में जो कुछ मिला था, उसका अनुभव तो किया जा सकता है, पर उसे व्यक्त करने में शब्द कम और कमजोर पड़ जाते हैं। इस घटना के दो दिन पहले इसी तरह का एक और वाकया हुआ था। जहां मैं रहता हूं पड़ोस में एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते हैं। इनके एक बेटा और एक बेटी है। शादी के बाद बेटी अपने इंजीनियर पति के साथ पुणे में है जबकि बेटा आस्ट्रेलिया में है। उनके मैडम को हार्ट प्राब्लम है, अच्छे डाक्टर को दिखाने के लिए शहर के दूसरे छोर पर मौजूद एक नामचीन डाक्टर को दिखा तो आए, लेकिन अब मुश्किल ये है कि उनकी दवा उनके आस पास के ही मेडिकल स्टोर पर मिलती है। लिहाजा दवा लाने में काफी दिक्कत होती है। एक दिन पार्क में टहलने के दौरान उन्होंने मुझे इस बात की जानकारी दी थी। अब जब भी मैं उस तरफ जाता हूं तो उनसे पूछ लेता हूं कि आपको दवा तो नहीं मंगानी है, कई बार मंगानी होती है, कई बार कहते हैं नहीं बेटा, अभी तो दवा है। वैसे अब दवा खत्म होने वाली रहती है तो दो तीन दिन पहले ही पर्चा और पैसे मेरे घर पर दे जाते हैं। संकोच नहीं करते, मुझे भी अच्छा लगता है। आप कह सकते हैं कि इससे आपको मिला क्या ? मैं बताता हूं कि इस बुजुर्ग दंपत्ति की जब भी किसी से मुलाकात होती है, वो उनसे हमारी इतनी तारीफ करते हैं, उसके आगे मेरा काम हल्का पड़ जाता है। मैं कार से निकलूं या फिर बाइक से कालोनी के लोग एक सम्मान की नजर से देखते हैं।
ये छोटे-छोटे कहानी किस्से हर आदमी के जीवन से जुड़े रहते हैं। जरूरत है इसे पहचानने की और एक सार्थक ऊर्जा के साथ सही उद्देश्य से खुद को जोड़ने की। मैने जब इन बातों की चर्चा अपने मित्र और कुछ रिश्तेदारों से की तो सभी लोग काफी प्रभावित हुए। सभी की इच्छा हुई कि क्यों ना हम सब एक छोटी सी संस्था बनाएं और लोगों को जोड़ कर इस तरह के काम को अंजाम दें। बात सभी को ठीक लगी और हमने एक संस्था का पंजीकरण करा लिया। अपने काम के अनुरूप संस्था का नामकरण किया गया। संस्था का नाम रखा गया " मैं हूं ना वेलफेयर सोसाइटी " अब ये संस्था रजिस्ट्रार फर्मस् सोसाइटीज में पंजीकृत है। संस्था के संसाधन सीमित हैं, इसलिए हम सभी अपनी क्षमता के अनुसार इसमें खुद ही शारीरिक और आर्थिक योगदान देते हैं और सामाजिक सरोकारों से जुडे कार्यों को अंजाम देते हैं।
हमारी संस्था के लोग प्रधानमंत्री के स्वच्छता मिशन से बहुत प्रभावित हैं। इसमें हम सभी अपनी तरह से योगदान कर रहे हैं। मकसद हमारा भी यही है कि देश में साफ सफाई रहे, लेकिन तरीका कुछ अलग है। हमारा प्रयास होता है कि सफाई करने के बजाए हम ऐसा माहौल बनाएं जिससे लोग गंदगी ही ना करें। इसके लिए हम लोगों को जागरूक करते हैं। छोटा सा उदाहरण देता हूं। कुछ दिन पहले मैं ट्रेन से दिल्ली जा रहा था। आप ने अक्सर देखा होगा कि लोग एसी कोच में भी चाय पीकर डिस्पोजल कप सीट के नीचे डाल देते हैं, या फिर खाना खाकर डिस्पोजल प्लेटस, पानी की खाली बोतल सीट के नीचे रखते हैं। कई बार लोगों के आने जाने के दौरान पैर से लग कर पूरे कोच में इधर-उधर कूडा फैलता है। इस बार मै अपने साथ दो साइज के पालीथीन बैग लेकर ट्रेन में सवार हुआ। ट्रेन के चलने पर मैने एसी टू के हर केबिन में एक-एक पालीथीन बैग दिया और आग्रह किया कि चाय के कप, डिस्पोजल प्लेट्स, पानी की बोतल या फिर और किसी भी तरह का कूडा इसी में रखिएगा। दिल्ली पहुंचने के पहले ही मैने अपने बड़े प्लास्टिक बैग में सभी केबिन से कूडे का पैकेट इकट्ठा कर लिया और नई दिल्ली स्टेशन पर मैने ये बैग कू़डेदान में डाल दिया।
आप समझ ही रहे होंगे कि ये कोई बहुत मेहनत का काम तो है नहीं। लेकिन इस दौरान हमारे इस छोटे से प्रयास की बहुत सारे लोगों ने न सिर्फ प्रशंसा की, बल्कि उन्होंने इस काम में हमारा साथ भी दिया। इतना ही नहीं बहुत सारे लोगों ने हमारी संस्था से जुड़ने की इच्छा भी जताई। हमने सभी के नाम पते और फोन नंबर लिए और उन्हें अपने साथ जोड़ लिया। मेरी कोशिश ये है कि हम लंबी चौड़ी बातें ना करें, बहुत ही प्रैक्टिकल होकर वही करें, जो करने में हम सक्षम हैं। हमारे पास कोई संसाधन तो है नहीं, लेकिन हमारा इरादा बुलंद है। यही वजह है कि हम दिन प्रति दिन आगे बढ़ते जा रहे हैं। मेरा आपसे भी आग्रह है कि संस्था के साथ जुडें और जहां हैं वहीं लोगों की मदद करें। अगर आपको लगता है कि हमारी संस्था बेहतर काम कर रही है तो इस संस्था को और मजबूत-कारगर बनाने के लिए आप हमारी आर्थिक मदद भी कर सकते हैं। मदद करने के लिए आप हमारे बैंक एकाउंट में अपनी इच्छानुसार मदद कर सकते हैं। हमारा कोई भी सदस्य कैश चंदा हासिल नहीं करेगा।
बैंक का नाम : BANK OF BARODA,
बैंक शाखा : INDIRA NAGAR BRANCH, LUCKNOW
बैंक में खाता का नाम : MAI HOON NA WELFARE SOCIETY
खाता संख्या: 29690100028900
आईएफएसई कोड: BARBOINDIRA
ब्रांच कोड: INDIRA
एमआईसीआर कोड: 226012017
उसकी इस छोटी सी खुशी में खुद को शामिल करता हुआ मैं वापस लौट रहा था और मन में तरह-तरह के विचार जन्म ले रहे थे। सच में कई बार जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जो आदमी को बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देती हैं। आदमी बीते जीवन में झांक कर आत्ममंथन करने लगता है कि अब तक उसने किया क्या और पाया क्या? सच कहूं तभी उसका हकीकत से सामना भी होता है। मसलन करने की सूची तो बहुत लंबी होती है, ये भी किया, वो भी किया, यहां भी किया, वहां भी किया, जिसने भी जो कहा, सब किया ! फिर बारी आती है कि इतना सब कुछ करने के बाद हासिल क्या हुआ ? आदमी दिमाग पर बहुत जोर डालता है कि सब कुछ करने के बाद हासिल क्या हुआ है, तब वो निराश हो जाता है, फिर उसे लगता है कि अब तक का तो जीवन ही बेमकसद रहा है, क्योंकि इतनी मेहनत, समय, त्याग, तपस्या के एवज में मिला क्या, कुछ भी तो नहीं। अब आदमी सोचता है कि क्या उसका मकसद गलत था या रास्ता ! तब उसकी आंख खुलती है और सामने आता है ए नया सच ! वो ये कि ना ही उसका रास्ता गलत था और ना ही मकसद गलत था, दरअसल उसने जीवन में कोई लक्ष्य ही तय नहीं किया था और बैल की तरह बिना लक्ष्य के मेहनत करता जा रहा था। जब हासिल करने का कुछ लक्ष्य ही सामने नहीं है तो किस्मत पर दोष देना बेमानी है।
इस छोटी सी मदद के एवज में जो कुछ मिला था, उसका अनुभव तो किया जा सकता है, पर उसे व्यक्त करने में शब्द कम और कमजोर पड़ जाते हैं। इस घटना के दो दिन पहले इसी तरह का एक और वाकया हुआ था। जहां मैं रहता हूं पड़ोस में एक बुजुर्ग दंपत्ति रहते हैं। इनके एक बेटा और एक बेटी है। शादी के बाद बेटी अपने इंजीनियर पति के साथ पुणे में है जबकि बेटा आस्ट्रेलिया में है। उनके मैडम को हार्ट प्राब्लम है, अच्छे डाक्टर को दिखाने के लिए शहर के दूसरे छोर पर मौजूद एक नामचीन डाक्टर को दिखा तो आए, लेकिन अब मुश्किल ये है कि उनकी दवा उनके आस पास के ही मेडिकल स्टोर पर मिलती है। लिहाजा दवा लाने में काफी दिक्कत होती है। एक दिन पार्क में टहलने के दौरान उन्होंने मुझे इस बात की जानकारी दी थी। अब जब भी मैं उस तरफ जाता हूं तो उनसे पूछ लेता हूं कि आपको दवा तो नहीं मंगानी है, कई बार मंगानी होती है, कई बार कहते हैं नहीं बेटा, अभी तो दवा है। वैसे अब दवा खत्म होने वाली रहती है तो दो तीन दिन पहले ही पर्चा और पैसे मेरे घर पर दे जाते हैं। संकोच नहीं करते, मुझे भी अच्छा लगता है। आप कह सकते हैं कि इससे आपको मिला क्या ? मैं बताता हूं कि इस बुजुर्ग दंपत्ति की जब भी किसी से मुलाकात होती है, वो उनसे हमारी इतनी तारीफ करते हैं, उसके आगे मेरा काम हल्का पड़ जाता है। मैं कार से निकलूं या फिर बाइक से कालोनी के लोग एक सम्मान की नजर से देखते हैं।
ये छोटे-छोटे कहानी किस्से हर आदमी के जीवन से जुड़े रहते हैं। जरूरत है इसे पहचानने की और एक सार्थक ऊर्जा के साथ सही उद्देश्य से खुद को जोड़ने की। मैने जब इन बातों की चर्चा अपने मित्र और कुछ रिश्तेदारों से की तो सभी लोग काफी प्रभावित हुए। सभी की इच्छा हुई कि क्यों ना हम सब एक छोटी सी संस्था बनाएं और लोगों को जोड़ कर इस तरह के काम को अंजाम दें। बात सभी को ठीक लगी और हमने एक संस्था का पंजीकरण करा लिया। अपने काम के अनुरूप संस्था का नामकरण किया गया। संस्था का नाम रखा गया " मैं हूं ना वेलफेयर सोसाइटी " अब ये संस्था रजिस्ट्रार फर्मस् सोसाइटीज में पंजीकृत है। संस्था के संसाधन सीमित हैं, इसलिए हम सभी अपनी क्षमता के अनुसार इसमें खुद ही शारीरिक और आर्थिक योगदान देते हैं और सामाजिक सरोकारों से जुडे कार्यों को अंजाम देते हैं।
हमारी संस्था के लोग प्रधानमंत्री के स्वच्छता मिशन से बहुत प्रभावित हैं। इसमें हम सभी अपनी तरह से योगदान कर रहे हैं। मकसद हमारा भी यही है कि देश में साफ सफाई रहे, लेकिन तरीका कुछ अलग है। हमारा प्रयास होता है कि सफाई करने के बजाए हम ऐसा माहौल बनाएं जिससे लोग गंदगी ही ना करें। इसके लिए हम लोगों को जागरूक करते हैं। छोटा सा उदाहरण देता हूं। कुछ दिन पहले मैं ट्रेन से दिल्ली जा रहा था। आप ने अक्सर देखा होगा कि लोग एसी कोच में भी चाय पीकर डिस्पोजल कप सीट के नीचे डाल देते हैं, या फिर खाना खाकर डिस्पोजल प्लेटस, पानी की खाली बोतल सीट के नीचे रखते हैं। कई बार लोगों के आने जाने के दौरान पैर से लग कर पूरे कोच में इधर-उधर कूडा फैलता है। इस बार मै अपने साथ दो साइज के पालीथीन बैग लेकर ट्रेन में सवार हुआ। ट्रेन के चलने पर मैने एसी टू के हर केबिन में एक-एक पालीथीन बैग दिया और आग्रह किया कि चाय के कप, डिस्पोजल प्लेट्स, पानी की बोतल या फिर और किसी भी तरह का कूडा इसी में रखिएगा। दिल्ली पहुंचने के पहले ही मैने अपने बड़े प्लास्टिक बैग में सभी केबिन से कूडे का पैकेट इकट्ठा कर लिया और नई दिल्ली स्टेशन पर मैने ये बैग कू़डेदान में डाल दिया।
आप समझ ही रहे होंगे कि ये कोई बहुत मेहनत का काम तो है नहीं। लेकिन इस दौरान हमारे इस छोटे से प्रयास की बहुत सारे लोगों ने न सिर्फ प्रशंसा की, बल्कि उन्होंने इस काम में हमारा साथ भी दिया। इतना ही नहीं बहुत सारे लोगों ने हमारी संस्था से जुड़ने की इच्छा भी जताई। हमने सभी के नाम पते और फोन नंबर लिए और उन्हें अपने साथ जोड़ लिया। मेरी कोशिश ये है कि हम लंबी चौड़ी बातें ना करें, बहुत ही प्रैक्टिकल होकर वही करें, जो करने में हम सक्षम हैं। हमारे पास कोई संसाधन तो है नहीं, लेकिन हमारा इरादा बुलंद है। यही वजह है कि हम दिन प्रति दिन आगे बढ़ते जा रहे हैं। मेरा आपसे भी आग्रह है कि संस्था के साथ जुडें और जहां हैं वहीं लोगों की मदद करें। अगर आपको लगता है कि हमारी संस्था बेहतर काम कर रही है तो इस संस्था को और मजबूत-कारगर बनाने के लिए आप हमारी आर्थिक मदद भी कर सकते हैं। मदद करने के लिए आप हमारे बैंक एकाउंट में अपनी इच्छानुसार मदद कर सकते हैं। हमारा कोई भी सदस्य कैश चंदा हासिल नहीं करेगा।
बैंक का नाम : BANK OF BARODA,
बैंक शाखा : INDIRA NAGAR BRANCH, LUCKNOW
बैंक में खाता का नाम : MAI HOON NA WELFARE SOCIETY
खाता संख्या: 29690100028900
आईएफएसई कोड: BARBOINDIRA
ब्रांच कोड: INDIRA
एमआईसीआर कोड: 226012017
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर
ReplyDeleteलोग साथ आते गये और कारवां बनता गया !
आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं ! खोया पाया के चक्करों में ना पड़ें ! आप जो कर रहे हैं वह आत्मसंतुष्टि के लिये कर रहे हैं और वह आपको भरपूर मिल रही है ! जब आप यही सोच कर काम करेंगे तो आपको बहुत खुशी मिलेगी ! आप नि:संदेह रूप से हर प्रकार की प्रशंसा और सराहना के अधिकारी हैं !
जी, हम हमेशा आप सभी के भरोसे पर खरा उतरने की कोशिश करेंगे।
Deleteइस नेक कार्य के लिए ईश्वर सदा सहायाक हो |
ReplyDeleteआपका बहुत बहुत आभार
Deleteआप नि:संदेह रूप सराहना के अधिकारी हैं !
ReplyDeleteशुक्रिया संजय जी
Delete